Saturday, October 17, 2015

हमने माना की कुछ नहीं ग़ालिब

हिंदी में लिखने का फ़ितूर अभी भी जारी है। पिछली बार कुछ मित्रों ने कहा की बात अधूरी सी रह गयी तो आज पूरी किये लेते हैं।  सबसे आसान है ख्वाहिशों पर बात करना। बचपन से ये ख़्वाहिश रही की मैं मशहूर हो जाऊं।

मेरे अंदर यह पैदायशी हुनर है की मैं अपना टैलेंट और दूसरों की कमियां बहुत जल्दी पहचान लेता हूँ। मुझे पता था की मेरे अंदर एक संगीतकार छुपा है। चूँकि महफ़िलों में गिटार बजाकर गाते हुए लोग अप्प्रिशियेट किये जाते हैं, मैंने एक गिटार लिया और शान से संगीत सीखने पहुँच गया।  गुरूजी बोले संगीत की शुरूवात तो हारमोनियम से की जाती है और 'सा पा रे गा'  प्रैक्टिस कराने लगे।  पूरे तीन दिन की कड़ी मेहनत के बाद भी जब मामला 'सा पा रे गा' पर ही अटका रहा तो मुझे एहसास हुआ की गुरूजी मेरी प्रतिभा को दुनिया के सामने आने ही नहीं देना चाहते। वो दिन था और आज का दिन है, गिटार अकेला किसी कोने में अपनी किस्मत को रो रहा है। एक बार गाने का भी प्रयास किया। हर गाने के बाद लोग बोलते थे बेहतर है।  मेरे खुश होने से पहले ही श्रीमती जी बोल उठीं उनका मतलब था अभी बहुत सुधार की ज़रूरत है।

पुरानी ख़्वाहिश रही है की मैं सारे शायरों को समझ पाऊँ। चाहत थी की महफ़िलों में मौकनुमा शेर पे शेर कहे जायेंगे और लोग तारीफों के पुल बांधते ना थकेंगे। किताबें पढ़ना इतना आसान ना था तो काफी समय ग़ज़लें सुनकर गुज़ारा गया। सब ठीक ही चल रहा था पर एक दिन जब पांच साल का बेटा हिज़्र की ग़ज़लें गाते पाया गया तो श्रीमतीजी ने अल्टीमेटम दिया की घर में सिर्फ़ हनी सिंह के ही गाने चलाये जायेंगे। अब तो चलती हुई गाड़ी में महफ़िलें जमती हैं जगजीत, ग़ुलाम अली और मेहँदी हसन की। ये सुरक्षित तो नहीं कहा जायेगा क्योंकि पहाड़ी रास्तों पर अगर ड्राइवर को नींद आ जाए तो रिस्क हो सकता है पर ज़िद है तो ज़िद है जी।

एक बार किसी महफ़िल में एक मोहतरमा को शेर सुनाने आरम्भ किये।  हर शेर के बाद उनके चेहरे का कौतूहल बढ़ता ही जाता था और चार पांच के बाद तो ऐसा लगा उन्होंने साक्षात डायनासोर देखा है। मैंने कहा घबराइये नहीं मैं तो सिर्फ़ आपसे फ़्लर्ट करने की कोशिश कर रहा हूँ। 'फ्लर्टिंग और आप' कहकर वो यूँ हंसी की उनकी आवाज़ आज तक कानों में गूंज़ती है। गनीमत थी अगर यह बात प्राइवेट रह जाती  पर बगल में श्रीमतीजी भी हँस रहीं थीं। अब जब भी वे इस वाक़ये की याद दिलातीं हैं मैं झट से फैज़ साहब का ये शेर सुना देता हूँ:

नहीं निगाह में मंज़िल तो ज़ुस्तज़ू ही सही
नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही

अगर आप ये सोच रहे हैं की मैं एब्नार्मल था जो बचपन से ही शायरी में दिलचस्पी रखता था तो गलत होगा।सभी बच्चों की तरह मैं सचिन तेंदुलकर ही बनना चाहता था पर बुरा हो गली में खेलने वाले उन बच्चों का जिन्होंने मुझे ठीक से खेलने का मौका नहीं दिया। मैं अपना बैट तक ले के जाता था और तब भी वे मुझसे सिर्फ़ फील्डिंग कराते थे और अक्सर फील्डिंग भी ऐसी जगह जहाँ शायद ही बॉल आती।

ऐसा नहीं है मैंने कुछ सीखने की कोशिश नहीं की। स्विमिंग पूल की मेम्बरशिप के लिए पूरे महीने प्रयास किया और उसके बाद दो हफ्ते स्विमिंग कॉस्ट्यूम और कोच खोजने में लगाये । दो दिन स्विमिंग के बाद रियलाइज़ हुआ ये जुकाम के लिए ठीक नहीं। स्टैमिना बनाने के लिए टेनिस सीखना स्टार्ट किया और समझ आया की जब तक रैकेट अच्छा न हो, खेल नहीं जमता। बारह हज़ार का रैकेट लिया और एक हफ्ते के अंदर वज़न कुछ कम सा महसूस होने लगा। हाथ में थोड़ा दर्द था सो अभी कुछ महीनों उसे आराम दे रहा हूँ। ये आप बिलकुल मत समझियेगा की मैं खाली बैठा हूँ, एक जिम की मेम्बरशिप ले ली गयी है और आजकल मैं अपने लिए सही एक्सरसाइज गूगल कर रहा हूँ। आपको ये जानकार ख़ुशी होगी की जल्दी ही मैं अपनी वो ट्राउज़र पहन पाऊंगा जो सात साल से मेरे पतले होने का इंतज़ार कर रही हैं।

मुझे पुस्तकें पढ़ना पसंद है और बड़ी तमन्ना रही है की लोग मुझे इंटेलेक्चुअल समझे। घर के ड्राइंग रूम में करीने से कुछ पढ़ी हुई और बहुत सारी बिना पढ़ी हाई फाई किताबें रखी हैं। पुस्तकें पढ़ते पढ़ते एक बार चेतन भगत की किताब हाथ लगी और रियलाइज़ हुआ की मेरे अंदर भी एक लेखक छुपा बैठा है। आइडियाज की कमी है पर कभी कभी लगता है अपनी आत्मकथा ही लिख डालूँ। अगर आप सोचते है की यह अभी का फितूर है तो आप सरासर गलत हैं। मैं सोलह साल का था जब अपनी आत्मकथा लिखनी आरम्भ की थी। पिताजी ने पहली बार न्यू ईयर डायरी न्यू ईयर पर दी थी वरना डायरी तो साल गुज़र जाने पर ही नसीब होती थी। उसी दिन जीवन के पच्चीस पन्ने लिखे गए थे पर वो प्रोजेक्ट अभी तक बाकी है।

जल्दी ही मैं एक प्यारा सा कुत्ता भी पालना चाहता हूँ। बचपन से ये अरमान रहा है पर इतने सालों के अध्ययन के बाद चला है की भारत में मौजूद 151 से भी ज्यादा प्रजातियों में से कौन सी मेरे लिए सबसे उपयुक्त रहेगी। बस अब उसे घर लाने की ही देर है वरना उसका नाम, ट्रेनिंग स्केडुल, परफेक्ट खाना सब ठीक कर लिया गया है।

वैसे मेरी सबसे बड़ी स्ट्रेंथ प्लानिंग है और मैं बड़े सलीके से पूरे साल भर का टारगेट सेट करता हूँ। श्रीमतीजी इन्हे हवाई किले बोलना पसंद करती हैं पर मैं बुरा नहीं मानता। उनके हिसाब से मैं अपने एम्बिशन के मुकाबले कितना नालायक हूँ पर देखिये प्लान तो सिर्फ़ एक मापदंड है यह जानने का की की आप अपने उद्देष्य के कितने करीब पहुंचे। आपने भी तो बचपन में पढ़ाई की मेज के सामने करीने से बनाया हुआ टाइम टेबल चिपकाया होगा, ज़रूरी नहीं की उसे फॉलो किया ही जाए।

अबतक समझ ही गए होंगे की मेरे बिटर हाफ से मेरी ख़ुशी देखी नहीं जाती। जब भी मैं कोई गुब्बारा फुलाता हूँ वो झट से उसे फोड़ देती हैं। दुनिया में सच्चे जौहरियों की सख़्त कमी है। मैं कहता हूँ देखो चारों तरफ कितने बेवकूफ़ भरे पड़े हैं और मेरी मुसीबत यह है की मैं उन्हें बिलकुल बर्दाश्त नहीं कर पाता। इस पर श्रीमतीजी तपाक से बोल उठती हैं की तुम अपने आप को बर्दाश्त कैसे करते हो। वैसे वो दिल की बुरी नहीं हैं और जब कभी मैं उनके उलाहनों से दुखी हो जाता हूँ तो वो समझाती हैं की बीवी के उलाहनों ने ही तुलसीदास को कहाँ से कहाँ पहुंचा दिया।

असल में मेरा मोल सिर्फ मैंने ही समझा है। अरे उन्हें तो मेरा कमाल का सेंस ऑफ़ ह्यूमर भी नहीं दिखता। चलो क्या हुआ अगर उसपर सिर्फ मुझे ही हंसी आती है पर उसे समझने के लिए जिस अक्ल की ज़रुरत है खुदा ने वो भी तो सबको नसीब नहीं की। वो कहती हैं तुम तो बेफिजूल ही आप से अभिभूत हो पर बताइये अगर कोई इतना कमाल का आदमी हो तो आप क्या उससे अभिभूत नहीं रहेंगे।

वैसे अगर ये मान भी लें की मुझे कुछ नहीं आता तो सच बात तो ये है की मेरे कुछ ना सीख पाने का कारण मेरी व्यस्तता रही है। काम का तो आलम ये है की उसके बारे में सोचते सोचते ही समय चला जाता है, यहाँ तक की काम करने का भी समय नहीं मिलता। आप शायद मानेंगे नहीं पर मेरा सबसे व्यस्त दिन तो छुट्टी वाला जाता है क्योंकि मैं बस सोचता ही रह जाता हूँ की कौन सा काम पहले किया जाये।

मान लिया हमारी यही नियति रहेगी पर आप ये शेर ही सुन लीजिये:

या रब ज़माना मुझको मिटाता है किसलिए
लौहे जहां पे हर्फ़े मुक़र्रर नहीं हूँ मैं

उम्मीद है इसको पढ़कर आप थोड़ा इम्प्रेस हुए होंगे, इसे कॉपी पेस्ट करने का यही उद्देश्य था। असल में इतनी उर्दू तो मुझे भी नहीं आती। अब इस लेख को ख़त्म किया जाये क्योंकि अगर आप इसे पहली बार पढ़कर पक रहे हैं तो सोचिये मुझे इसे लिखते हुए कितनी बार पढ़ना पड़ा होगा।

अगर बातों ही बातों में आपने यहाँ तक पढ़ लिया तो मैं शायद इस शेर की तरह तो बन ही गया हूँ:

हमने माना की कुछ नहीं ग़ालिब
मुफ्त हाथ आये तो बुरा क्या है  

1 comment:

संजीव तिवारी said...

कुछ भी पढ़ा व्यर्थ नहीं जाता और कुछ भी लिखा भी।
हमने ग़ालिब को पढ़ा है मेरे दोस्त
वो बेवकूफ होता तो शायर कौन होता @तमंचा रायपुरी